माँ कुष्मांडा
ब्रह्मांड की सृष्टिकर्त्री • अष्टभुजा देवी
जन्म कथा और महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार था। तब माँ कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड का निर्माण किया। इसलिए इन्हें "आदि स्वरूप" और "सृष्टि की आदिशक्ति" कहा जाता है। माँ कुष्मांडा ने अपनी ऊर्जा से सूर्य की उत्पत्ति की और पूरे ब्रह्मांड में प्रकाश का संचार किया। वे सूर्य के भीतर निवास करती हैं और अपनी दिव्य शक्ति से जगत को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
माँ कुष्मांडा का दिव्य स्वरूप
- इनके चेहरे पर सदा दिव्य मुस्कान रहती है
- इनका वाहन सिंह है
- इन्हें "अष्टभुजा देवी" भी कहा जाता है
- इनका निवास सूर्य मंडल में है
- ये अनाहत चक्र की अधिष्ठात्री हैं
पूजन विधि
माँ कुष्मांडा के मंत्र
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे॥
पूजन से मिलने वाले लाभ
पूजा का महत्व
माँ कुष्मांडा की उपासना से भक्त को आरोग्य, आयु, संपन्नता और सुख-शांति मिलती है। वे साधक के जीवन से अंधकार को दूर करके प्रकाश का संचार करती हैं। माँ कुष्मांडा अनाहत चक्र की अधिष्ठात्री हैं, इसलिए उनकी उपासना से हृदय चक्र जागृत होता है और भक्त को आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मिलता है।
भक्तों की मान्यताएँ
भक्त मानते हैं कि माँ कुष्मांडा की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। श्रद्धालु उनके पूजन में कुम्हड़ा (कुष्मांड) अर्पित करते हैं, जिसे वे अत्यंत प्रिय मानती हैं। यह माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माँ कुष्मांडा की आराधना करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।
